Haryana Election 2024: हरियाणा में चुनाव के दौरान कांग्रेस को देखने को मिला उतार-चढ़ाव,फिर भी कैसे बाधाओं को किया पार

Haryana Congress Leaders

नरेन्द्र सहारण, चंडीगढ़ : Haryana Election 2024: चुनावी मुकाबले में कांग्रेस को कई उतार-चढ़ाव का सामना करना पड़ा। खासकर जब सांसद कुमारी सैलजा करीब एक पखवाड़े तक चुनाव प्रचार से दूर रहीं, तो इसका कांग्रेस को नुकसान उठाना पड़ा। हालांकि, पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा और उनके सांसद बेटे दीपेंद्र सिंह हुड्डा ने पूरी ताकत से प्रचार में हिस्सा लिया, यहां तक कि उन्होंने उन इलाकों में भी जनसभाएं कीं, जहां सैलजा समर्थक उम्मीदवार मैदान में थे। एग्जिट पोल के नतीजों ने कांग्रेस को राज्य में पूर्ण बहुमत की उम्मीद जताई है, जबकि भाजपा तीसरी बार सत्ता में वापसी की कोशिश कर रही है।

60 से ज्यादा सीटों की जीत का दावा

कांग्रेस कार्यकर्ता एग्जिट पोल से उत्साहित हैं, लेकिन भाजपा भी हार मानने को तैयार नहीं है। भाजपाई चमत्कारी परिणाम की उम्मीद लगाए हैं, जबकि कांग्रेस के रणनीतिकार यह आंकलन कर रहे हैं कि कितनी सीटों पर जीत के बाद सरकार बन सकती है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं, पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा, प्रदेश अध्यक्ष चौधरी उदयभान और सांसद कुमारी सैलजा ने 60 से ज्यादा सीटों की जीत का दावा किया है।

चौधरी उदयभान को उम्मीद है कि कांग्रेस इस बार 2005 में हासिल की गई 67 सीटों का रिकॉर्ड तोड़ सकती है। हालांकि, मुख्यमंत्री पद की रेस में भूपेंद्र हुड्डा और कुमारी सैलजा के नाम प्रमुख रूप से लिए जा रहे हैं, लेकिन एग्जिट पोल के बाद दीपेंद्र सिंह हुड्डा का नाम भी जोर-शोर से उभर कर सामने आया है।

दीपेंद्र की कड़ी मेहनत की सराहना

कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने दीपेंद्र की कड़ी मेहनत की सराहना की है। दीपेंद्र ने चुनाव प्रचार के दौरान 85 से अधिक जनसभाओं को संबोधित किया, जबकि भूपेंद्र हुड्डा ने भी लगभग 75 जनसभाएं कीं। दीपेंद्र के चुनावी प्रबंधन और सामूहिक नेतृत्व की शैली को लेकर इंटरनेट मीडिया पर भी उनकी सराहना हो रही है। उन्हें मुख्यमंत्री पद के चेहरे के रूप में पेश किया जा रहा है। दीपेंद्र ने फतेहाबाद, साढौरा, कालका और पंचकूला जैसे क्षेत्रों में भी प्रचार किया, जहां सैलजा समर्थक उम्मीदवार थे। वहीं, भूपेंद्र हुड्डा ने उचाना कलां, साढौरा, नारायणगढ़ और असंध में जनसभाएं कीं, यह संदेश देने के लिए कि उनकी नजर हर सीट पर है, चाहे उम्मीदवार उनके पसंद के हों या नहीं।

भाजपा के लिए फायदेमंद नहीं रही सैलजा की नाराजगी

कुमारी सैलजा की नाराजगी भाजपा के लिए फायदेमंद नहीं रही। दरअसल, सैलजा के चुनाव प्रचार से दूर रहने के कारण भाजपा ने कांग्रेस के खिलाफ अभियान चलाने का मौका पाया था। सैलजा ने कभी इशारों में तो कभी सीधे यह आरोप लगाया कि दलित समाज कांग्रेस से नाराज है। भाजपा ने इस मुद्दे को भुनाने की कोशिश की, और प्रचार में इसे कांग्रेस के खिलाफ एक बड़ा हथियार बना दिया। हालांकि, कांग्रेस ने अपनी रणनीति में बदलाव किया और राहुल गांधी के नेतृत्व में अशोक तंवर को पार्टी में वापस शामिल कर लिया। तंवर की एंट्री से भाजपा के दलित विरोधी प्रचार का असर कम हो गया।

सुरजेवाला ने चुनाव प्रचार में लिया संयम से काम

दूसरी ओर, कांग्रेस के नेता रणदीप सिंह सुरजेवाला ने चुनाव प्रचार में संयम से काम लिया। उन्होंने अपने को कैथल और जींद जिले के नरवाना तक सीमित रखा, जहां उनके बेटे आदित्य सुरजेवाला चुनाव लड़ रहे थे। सुरजेवाला ने यहां पर कम प्रचार किया, लेकिन अपनी पूरी ताकत आदित्य की जीत में झोंक दी। नरवाना में इनेलो पार्टी से मुकाबला हुआ, लेकिन सुरजेवाला ने विवादों से दूर रहकर चुनावी रणनीति को मजबूती दी। अगर आदित्य जीतते हैं, तो सुरजेवाला उन्हें मंत्री बनाने के लिए पूरी कोशिश करेंगे।

इस तरह, कांग्रेस और भाजपा दोनों ने अपनी-अपनी रणनीतियों के तहत चुनाव प्रचार किया। कांग्रेस ने भूपेंद्र हुड्डा और दीपेंद्र हुड्डा की ताकतवर टीम बनाई, जबकि भाजपा ने सैलजा और तंवर के मुद्दों पर केंद्रित होकर अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश की। अब सबकी निगाहें चुनाव परिणामों पर हैं, जो कांग्रेस और भाजपा दोनों के लिए निर्णायक साबित होंगे।

 

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