हरियाणा पुलिस के हिरासत के दौरान पुलिस थाने में अत्याचार की शिकायत के बाद सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी

नई दिल्ली, बीएनएम न्यूज: Supreme Court strong comment: हाल ही में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के पुलिस महानिदेशकों को स्पष्ट और सख्त निर्देश दिए हैं कि वे हिरासत में लिए गए व्यक्तियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सभी आवश्यक उपाय करें। यह निर्णय न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा की पीठ द्वारा लिया गया, जो मानवाधिकारों और पुलिस के कार्यों में पारदर्शिता पर महत्वपूर्ण ध्यान देने की आवश्यकता को उजागर करता है। सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की कि जब एक देश में अपराधियों को भी उनकी गरिमा बनाए रखने के लिए सुरक्षा दी जाती है, तो किसी आरोपित के साथ ऐसा नहीं होना चाहिए।
पुलिस की महत्वपूर्ण भूमिका
कोर्ट ने अपनी टिप्पणियों में कहा कि पुलिस राज्य मशीनरी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसकी जिम्मेदारी न केवल समाज के सुरक्षा में बल्कि व्यक्तिगत अधिकारों की रक्षा में भी होती है। अदालत ने बताया कि पुलिस पर लोगों का विश्वास बनाए रखना आवश्यक है, और इसे सुनिश्चित करने के लिए सही कार्यवाही और मानवाधिकारों का सम्मान अत्यंत महत्वपूर्ण है।
इस दिशा में अदालत ने हरियाणा के एक वकील द्वारा पेश की गई दंड प्रक्रिया संहिता 1973 की धारा 41(1)(बी) (ii) के तहत की गई चेकलिस्ट का संदर्भ भी दिया। हालाँकि, पीठ ने स्पष्ट किया कि पेश की गई चेकलिस्ट केवल एक औपचारिकता की तरह नजर आती है और इसका संबंधित अनुपालन मानक नहीं है।
एक गंभीर प्रकरण का उदाहरण
यह निर्णय तब सामने आया जब एक व्यक्ति ने आरोप लगाया कि हरियाणा पुलिस ने उसे हिरासत में रखने के दौरान शारीरिक दुर्व्यवहार किया और गिरफ्तारी संबंधी कानूनों का उल्लंघन किया। शिकायतकर्ता के वकील ने अदालत को बताया कि पुलिस ने बिना किसी उचित आधार के कार्रवाई की, जबकि आरोपित के भाई ने पुलिस अधीक्षक को हिरासत में लिए जाने की चिंता व्यक्त करते हुए ईमेल भेजा था।
इस देश में कानून और मानवाधिकारों की स्थिति को देखते हुए पीठ ने कहा कि पुलिस का अत्याचार स्पष्ट है। अदालत ने यह भी कहा कि यदि कोई व्यक्ति अपराधी भी है, तो उसके साथ कानून के अनुसार ही व्यवहार किया जाना चाहिए।
मानवाधिकारों की रक्षा
अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि भारतीय कानून एक अपराधी को भी व्यक्तित्व और गरिमा का संरक्षण प्रदान करता है। जब पुलिस ने अभियुक्त को उठाया, तो वह केवल एक आरोपित था, और ऐसा व्यवहार नहीं किया जाना चाहिए था जो उसकी गरिमा पर आघात करे। पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि नागरिकों से अपेक्षा की जा सकती है कि वे कानून का पालन करें, लेकिन पुलिस से नहीं।
भविष्य में सावधानी बरतने की चेतावनी
कोर्ट ने संबंधित पुलिस अधिकारियों को भविष्य में अधिक सावधान रहने का निर्देश दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पुलिस महानिदेशक यह सुनिश्चित करेंगे कि ऐसे मामलों की पुनरावृत्ति न हो। वास्तविकता यह है कि वरिष्ठ अधिकारियों को उन मामलों के प्रति पूरी सहिष्णुता नहीं रखनी चाहिए, जहां अधीनस्थ अधिकारियों ने किसी के अधिकारों का उल्लंघन किया हो।
इस दृष्टिकोण से, अदालत ने विश्वास व्यक्त किया कि पुलिस महानिदेशक इस विषय में संवेदनशील होंगे और भविष्य में ऐसी घटनाएँ नहीं होंगी। यदि किसी भी प्रकार की गंभीरता में ऐसे मामले फिर से सामने आते हैं, तो पीठ ने स्पष्ट किया कि कठोर कार्रवाई की जाएगी और दोषी पुलिस कर्मियों के खिलाफ दंडात्मक उपाय किए जाएंगे।
महत्वपूर्ण संकेत
कोर्ट द्वारा दिए गए इस सख्त निर्देश का मुख्य उद्देश्य पुलिस की कार्यप्रणाली में सुधार करना और नागरिकों के मानवाधिकारों की रक्षा करना है। यह निर्णय एक महत्वपूर्ण संकेत है कि भारत का न्याय तंत्र मानवाधिकारों के उल्लंघन के मामलों में लिप्त नहीं रहेगा और ऐसे मामलों को प्राथमिकता के साथ सुलझाने का प्रयास करेगा।
सुप्रीम कोर्ट का यह कदम निश्चित रूप से पुलिस की कार्यप्रणाली में सुधार का एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकता है और यह सुनिश्चित करेगा कि हिरासत में लिए गए व्यक्तियों को केवल कानूनी प्रक्रिया का पालन होते हुए ही नहीं बल्कि उनके अधिकारों और गरिमा की रक्षा करते हुए भी देखा जाए।
भारत न्यू मीडिया पर हिंदी में ब्रेकिंग न्यूज, Hindi News देश-विदेश की ताजा खबर, लाइव न्यूज अपडेट , धर्म-अध्यात्म और स्पेशल स्टोरी पढ़ें और अपने आप को रखें अप-टू-डेट। National News in Hindi के लिए क्लिक करें इंडिया सेक्शन