पराली प्रबंधन को लेकर कैथल जिले के लांबा खेड़ी गांव में किसान महा पंचायत प्रदूषण के लिए किसान दोषी नही, गुरनाम सिंह सहारण:
नरेन्द्र सहारण कैथल : प्रदूषण आज के समय में एक गंभीर वैश्विक समस्या बन चुका है, जिसका प्रभाव पर्यावरण, मानव स्वास्थ्य और जैव विविधता पर पड़ रहा है। अक्सर प्रदूषण के लिए उद्योगों, वाहनों और शहरीकरण को जिम्मेदार ठहराया जाता है, लेकिन कई बार किसानों को भी इस समस्या का दोषी माना जाता है, खासकर पराली जलाने जैसे मुद्दों के कारण। हालांकि, यह कहना कि किसान प्रदूषण के मुख्य दोषी हैं, एक अतिशयोक्ति और अन्यायपूर्ण है इस विषय पर कैथल के लांबा खेडी मे किसान पंचायत हुई। किसानो तर्क है कि किसान प्रदूषण के लिए दोषी नहीं हैं, बल्कि वे स्वयं इस समस्या के शिकार हैं और उनके पास सीमित विकल्प हैं।
किसानों की स्थिति और मजबूरियां गुरनाम सहारण
गुरनाम सहारण कहते है किसान देश की रीढ़ हैं। वे अन्नदाता के रूप में समाज को भोजन प्रदान करते हैं। लेकिन उनकी आर्थिक स्थिति, संसाधनों की कमी और सरकारी नीतियों में अपर्याप्त समर्थन उन्हें कई बार ऐसी प्रथाओं की ओर ले जाता है, जिन्हें प्रदूषण से जोड़ा जाता है। उदाहरण के लिए, पराली जलाना, जो उत्तर भारत में वायु प्रदूषण का एक प्रमुख कारण माना जाता है, किसानों की मजबूरी का परिणाम है। पराली जलाने की प्रथा इसलिए प्रचलित है क्योंकि:
1. **आर्थिक तंगी**:
पराली को हटाने या प्रबंधन के लिए आधुनिक मशीनरी जैसे हैप्पी सीडर या स्ट्रॉ मैनेजमेंट सिस्टम की लागत बहुत अधिक है। छोटे और मध्यम वर्ग के किसानों के लिए ऐसी मशीनरी खरीदना या किराए पर लेना संभव नहीं होता।
2. **समय की कमी**:
फसलों के बीच का समय बहुत कम होता है। एक फसल कटने के बाद दूसरी फसल बोने के लिए किसानों को खेत जल्दी तैयार करना पड़ता है। पराली को जलाना सबसे तेज और सस्ता तरीका लगता है।
3. **जागरूकता और संसाधनों की कमी**:
कई किसानों को पराली के वैकल्पिक उपयोग, जैसे बायोमास या खाद बनाने, की जानकारी नहीं होती। साथ ही, ऐसी तकनीकों के लिए बुनियादी ढांचा और सरकारी समर्थन भी अपर्याप्त है।
प्रदूषण के असल कारण
प्रदूषण के लिए किसानों को दोष देना आसान है, लेकिन वास्तविकता यह है कि प्रदूषण के प्रमुख स्रोत कहीं और हैं। उदाहरण के लिए:
– **औद्योगिक उत्सर्जन**: फैक्ट्रियां और उद्योग बड़े पैमाने पर जहरीली गैसें और कचरा उत्सर्जित करते हैं, जो वायु, जल और मिट्टी प्रदूषण का कारण बनते हैं।
– **वाहन उत्सर्जन*शहरों में बढ़ता वाहनों का उपयोग और पुराने वाहनों से निकलने वाला धुआं वायु प्रदूषण का एक बड़ा कारण है।
– **निर्माण गतिविधियां**:
अनियोजित शहरीकरण और निर्माण से धूल और कचरा प्रदूषण बढ़ता है।
– **अपर्याप्त कचरा प्रबंधन**:
कचरे का अनुचित निपटान और प्लास्टिक का बढ़ता उपयोग जल और मिट्टी प्रदूषण को बढ़ावा देता है।
इन सभी कारकों की तुलना में पराली जलाने का योगदान सीमित है और यह एक मौसमी समस्या है, जो कुछ हफ्तों तक ही प्रभावी रहती है। इसके बावजूद, किसानों को अक्सर दोष का भागी बनाया जाता है, जबकि उद्योगों और शहरी गतिविधियों पर उतना ध्यान नहीं दिया जाता।
किसानों का पक्ष
किसानों का पक्ष रखते हुए किसान नेता जियालाल सिंहमार कहतें है किसान स्वयं प्रदूषण के दुष्प्रभावों का सामना करते हैं। रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का उपयोग, जो अक्सर खेती में अनिवार्य हो जाता है, मिट्टी और जल को प्रदूषित करता है, जिसका सीधा असर किसानों और उनके परिवारों पर पड़ता है। इसके अलावा, प्रदूषित हवा और पानी से होने वाली बीमारियां ग्रामीण क्षेत्रों में भी आम हो रही हैं। किसान न तो प्रदूषण का कारण बनना चाहते हैं और न ही इसके दुष्प्रभावों को भुगतना चाहते हैं, लेकिन उनकी मजबूरियां और संसाधनों की कमी उन्हें ऐसा करने के लिए विवश करती है।
समाधान और सरकार की भूमिका
प्रदूषण को कम करने के लिए किसानों को दोष देने के बजाय, सरकार और समाज को मिलकर उनकी मदद करनी चाहिए। कुछ संभावित समाधान हैं:
1. **सस्ती तकनीक उपलब्ध कराना**:
पराली प्रबंधन के लिए मशीनों को सब्सिडी पर उपलब्ध कराया जाए।
2. **जागरूकता और प्रशिक्षण**:
किसानों को पराली के वैकल्पिक उपयोग, जैसे बायोगैस, खाद, या बायोमास, के बारे में प्रशिक्षित किया जाए।
3. **आर्थिक सहायता**:
छोटे और सीमांत किसानों को आर्थिक सहायता प्रदान की जाए ताकि वे आधुनिक तकनीकों को अपना सकें।
4. **नीतिगत सुधार**:
प्रदूषण के लिए जिम्मेदार उद्योगों और शहरी गतिविधियों पर सख्त नियम लागू किए जाएं।
निष्कर्ष
किसान नेता सुरेंद्र चौसाला ने कहा किसान प्रदूषण के दोषी नहीं हैं; वे केवल परिस्थितियों के शिकार हैं। उनकी मजबूरियां, आर्थिक तंगी और संसाधनों की कमी उन्हें ऐसी प्रथाओं की ओर धकेलती है, जो पर्यावरण को नुकसान पहुंचाती हैं। प्रदूषण की समस्या को हल करने के लिए हमें किसानों को सहायता और समर्थन प्रदान करना होगा, न कि उन्हें दोष देना। समाज और सरकार को मिलकर यह सुनिश्चित करना चाहिए कि किसानों को पर्यावरण-अनुकूल खेती के लिए प्रोत्साहन और संसाधन मिलें। केवल सहयोग और समन्वय से ही हम प्रदूषण की इस जटिल समस्या का समाधान ढूंढ सकते हैं।प्रदूषण एक गंभीर समस्या है, लेकिन इसके लिए किसानों को दोष देना गलत है। पराली जलाना, जो वायु प्रदूषण से जोड़ा जाता है, किसानों की मजबूरी है। आर्थिक तंगी, समय की कमी और संसाधनों का अभाव उन्हें ऐसा करने को मजबूर करता है। वास्तव में, उद्योगों, वाहनों और शहरीकरण से होने वाला प्रदूषण कहीं अधिक गंभीर है। किसान स्वयं प्रदूषण के शिकार हैं, क्योंकि रासायनिक उर्वरक और प्रदूषित हवा-जल उनका स्वास्थ्य खराब करते हैं।समाधान के लिए सरकार को सस्ती तकनीक, जागरूकता और आर्थिक सहायता प्रदान करनी चाहिए। किसानों को दोष देने के बजाय, उनकी मदद करनी होगी। सहयोग से ही प्रदूषण की समस्या का समाधान संभव है।
