Kaithal News: पराली जलाने वाले 97 किसानों की रेड एंट्री, दो साल एमएसपी पर नहीं बेच सकेंगे फसल

Parali Burning

नरेन्‍द्र सहारण , कैथल : Kaithal News: हरियाणा के कैथल जिले में धान की कटाई का सीजन खत्म हो चुका है और अब गेहूं की बुआई जोरों पर है। जिले में अब तक करीब 80 प्रतिशत गेहूं की बुआई पूरी हो चुकी है। कृषि विभाग के अनुसार, अब तक 1 लाख 45 हजार हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में गेहूं की बुआई की जा चुकी है। अभी केवल 20 प्रतिशत क्षेत्र में ही बुआई का काम बाकी है। पिछले साल की तुलना में इस बार पराली जलाने के मामलों में कमी देखी गई है, लेकिन एफआईआर और दंड की संख्या में वृद्धि हुई है।

पराली जलाने के मामलों में मामूली कमी

पिछले वर्ष जिले में 270 स्थानों पर पराली जलाने की घटनाएं दर्ज हुई थीं, जबकि इस साल यह संख्या घटकर 190 रह गई है। हालांकि, एफआईआर की संख्या में इजाफा हुआ है। पिछले साल जहां 72 किसानों के खिलाफ मामले दर्ज हुए थे, वहीं इस साल अब तक 97 किसानों पर केस दर्ज किए जा चुके हैं। इन मामलों में कृषि विभाग ने दो लाख पचास हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया है, जबकि पिछले साल यह आंकड़ा छह लाख पचास हजार रुपये था।

प्रतिबंधित सुविधाएं और आर्थिक नुकसान

धान अवशेष जलाने वाले किसानों को कड़ी सजा दी जा रही है। जिन 97 किसानों पर केस दर्ज किए गए हैं, उन्हें अगले दो वर्षों तक “मेरी फसल मेरा ब्योरा” पोर्टल पर एमएसपी पर फसल बेचने की अनुमति नहीं होगी। इसके अलावा, सरकार द्वारा दी जाने वाली अन्य कृषि संबंधित सुविधाओं से भी वंचित रखा जाएगा। इन किसानों की पोर्टल पर प्रविष्टि को रेड मार्क कर दिया गया है।

पराली की मांग में कमी

धान कटाई के बाद पराली का उचित प्रबंधन सुनिश्चित करने के लिए किसानों को पराली की गांठें बनवाने के लिए प्रेरित किया गया। हालांकि, इस साल पराली की मांग में कमी देखी गई। जिले के कांगथली गांव स्थित एकमात्र पराली प्रसंस्करण संयंत्र में पहले से ही पर्याप्त स्टॉक मौजूद है। इस बार संयंत्र में केवल 1 लाख 40 हजार मीट्रिक टन पराली की मांग की गई, जो पिछले वर्षों की तुलना में कम है।

राजस्थान, जहां बड़ी मात्रा में पराली भेजी जाती थी, वहां से भी इस बार डिमांड कम रही। डिमांड में कमी के चलते पराली की कीमतें गिर गईं, जिससे किसानों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा। ऐसे में कई किसानों ने पराली को इकट्ठा करने के बजाय खेतों में ही आग लगा दी।

जागरूकता और दंडात्मक कार्रवाई

पराली प्रबंधन को बेहतर बनाने के लिए कृषि विभाग ने इस साल 272 टीमें गठित कीं, जिनमें 1300 से अधिक कर्मचारी शामिल थे। ये टीमें जिले के सातों ब्लॉकों में किसानों को जागरूक करने और पराली जलाने के दुष्प्रभावों के बारे में जानकारी देने का काम कर रही हैं। सहायक कृषि अभियंता जगदीश मलिक ने बताया कि सरकार किसानों को पराली प्रबंधन के लिए प्रोत्साहन देती है, लेकिन इसके बावजूद कई किसान पराली जलाने से परहेज नहीं कर रहे।

पराली जलाने से जमीन की उर्वरता को नुकसान होता है और पर्यावरण भी प्रदूषित होता है। किसानों को बार-बार समझाने और वैकल्पिक उपाय बताने के बाद भी यदि वे पराली जलाते हैं, तो उन पर कार्रवाई की जा रही है।

पराली जलाने के खिलाफ कड़ा रुख

पराली जलाने के मामलों पर अंकुश लगाने के लिए सरकार ने सख्त रुख अपनाया है। जिन किसानों ने धान अवशेष जलाए, उन्हें न केवल जुर्माना भरना पड़ा, बल्कि उनके नाम सरकारी पोर्टल पर चिह्नित कर दिए गए हैं। यह कदम किसानों को पर्यावरण और कृषि के प्रति जिम्मेदार बनाने के लिए उठाया गया है।

किसानों के लिए विकल्प जरूरी

पराली जलाने की समस्या से निपटने के लिए सरकार और संबंधित विभागों को किसानों के लिए बेहतर विकल्प उपलब्ध कराना जरूरी है। किसानों को पराली प्रबंधन के लिए वित्तीय सहायता, उपकरण और बाजार से जुड़ने के अवसर प्रदान करने चाहिए। इसके अलावा, पराली के उपयोग से संबंधित उद्योगों को प्रोत्साहित करना भी इस समस्या का स्थायी समाधान हो सकता है।

इस साल के अनुभवों से यह साफ है कि जागरूकता और सख्ती के बीच संतुलन बनाकर ही पराली जलाने की समस्या को हल किया जा सकता है। किसानों के सहयोग और सरकारी प्रयासों से आने वाले वर्षों में इस स्थिति में और सुधार की उम्मीद की जा सकती है।

 

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